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Sunday, November 7, 2010

भूलना तो मुश्किल होगा

भूलना तो मुश्किल होगा,तेरा साथ जो याद आया है,
मिटाना तो मुश्किल होगा,वक़्त ग़ज़ल जो लिख आया है,
ख्वाहिशों के तूफान खामोशी की रात बन गये,
अब रूकना तो मुश्किल होगा,अश्कों का जो सैलाब आया है.

जुड़ पाना तो मुश्किल होगा,नाता जो टूट आया है,
सुन पाना तो मुश्किल होगा,तू आगोश में किसी के आया है,
ना जाने क्यों उस डगर को ताकती हैं निगाहें मेरे,
आगाज़ तो मुश्किल होगा,जमाने से उस पर सुनसान आया है,

बिगाड़ना तो मुश्किल होगा,जिस मकान को जन्मों से बनाया है,
जताना तो मुश्किल होगा ,अरमानों के गुलिस्ताँ में जो पतझड़ आया है,
बंदिशों को तोड़ आज 'अवी' कह दे उस खुदा से,
सम्हालना तो मुश्किल होगा ,शराब का नशा जो चढ़ आया है.