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Monday, October 1, 2012

वो लम्हा

आज फिर देखो,
वो मदमस्त हवा,
चहारदीवारी के अंदर घुस कर,
मेरे किताब के पिछले पन्ने फिर पलट गई,
और मिठास दे गई इन होंठों पर,
चाय की वो मासूम चुस्कियाँ
जो कभी नुक्कड़ के किनारे,
खुले आसमान के नीचे,
हमनें एक ही जूथे गिलास में पी थी...
और इस तरह,
इस काले-घने धुनध में
वो लम्हा एक बार फिर जी गया..
वो लम्हा एक बार फिर जी गया...!

-Thursday, Sept 27th 2012, 12:25 am