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Wednesday, October 9, 2013

दराज़ें

ना जाने क्यूँ,
मेरे लाख मरम्मत पर भी,
मेरे घर के दीवार में एक दराज,
भारती ही नहीं है कभी..

ना जाने कैसे भरी होंगी,
दूसरों ने घरों की ये दराज़ें,
और फिर चैन से रात में,
चादर तांन के सोते होंगे..

क्यूकी इन्हीं दराज़ों से आती हैं,
वो रात के सन्नाटे मे,
दबी हुई किसी की सिसकियाँ,
कुछ दबा हुई सी चीखें भी,
जो सोने नई देती मुझे...

शायद एक दिन सीख लूँगा,
इन दराज़ों को भरना,
या सीख लूँगा अपना बनाना
इन चीख को और सिसकियों को...!!

*दराज़ें = दरारें.

1: 40 am
10th October,13
Bangalore

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