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Thursday, April 4, 2013

धुआँ और यादें



बिखरी हुई सी यादें है,
धुंधले से कुछ नज़ारे है,
बेहिसाब बहता वक्त है,
और उलझे से कुछ इरादे हैं..

गुमनाम क़हकसा सा है,
माँ से किए कुछ वादे हैं,
तेरा क्या, क्या मेरा है,
हम सब यहाँ कुछ प्यादे हैं...

लंबी परछाईयाँ सी हैं,
उससे भी लंबे जाले हैं,
सब धू धू करके जल रहा है,
हर तरफ धुआँ है, और यादें हैं..
हर तरफ धुआँ है, और यादें हैं....!



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