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Tuesday, October 22, 2013

कश्ती

जो कश्ती जुनून-ए-इश्क़ में समंदर निगल गई..
नादानी है उससे यूँ साहिल की बात छेड़ना...!

Wednesday, October 9, 2013

दराज़ें

ना जाने क्यूँ,
मेरे लाख मरम्मत पर भी,
मेरे घर के दीवार में एक दराज,
भारती ही नहीं है कभी..

ना जाने कैसे भरी होंगी,
दूसरों ने घरों की ये दराज़ें,
और फिर चैन से रात में,
चादर तांन के सोते होंगे..

क्यूकी इन्हीं दराज़ों से आती हैं,
वो रात के सन्नाटे मे,
दबी हुई किसी की सिसकियाँ,
कुछ दबा हुई सी चीखें भी,
जो सोने नई देती मुझे...

शायद एक दिन सीख लूँगा,
इन दराज़ों को भरना,
या सीख लूँगा अपना बनाना
इन चीख को और सिसकियों को...!!

*दराज़ें = दरारें.

1: 40 am
10th October,13
Bangalore

Saturday, April 20, 2013

फूल हो तुम

फूल हो तुम, क्यूँ वक्त जाया कर जाओगे..
पास आओगे तो, इस आग से जल जाओगे..!!

तुम्हें अंदाज़ा नहीं है इस समंदर की गहराई का..
इसमें उतरोगे तो, बेवजह डूब के बह जाओगे..!!

उस खुदाई तो रोज़ का खेल है तमाशा बनाना..
टूट जाएगा तो, फिर क्यूँ आशियाँ बनाओगे..!!

जब कभी पूछोगे तो जवाब मिलेगा "आवारगी",
वो खुदाई और तुम, बस मुस्कुरा के रह जाओगे...!!

Wednesday, April 17, 2013

थका हारा इंसान


कितना थका, कितना हारा,
किस्मत का मारा, देखो
वो इंसान जा रहा है..

किसी ने बोला शराबी है,
किसी ने बोला छलावा है,
किसी ने बोला भिखारी है,
गाली, लातें देकर,
सबने उसको निकाला है,
किसी ने न जाना,
बेचारा वो प्यार का मारा है,
दो बूँद प्यार की तलाश में
वो सड़कों की धूल खा रहा है..

दर दर की ठोकर खाकर,
गिरता पड़ता, देखो,
वो इंसान जा रहा है...

ज़िंदगी और सिगरेट

यूँ तो ज़िंदगी ही जला जला कर फूँकते हैं रोज़..
बस एक बदलाव के लिए कभी कभी सिगरेट जला लेते हैं...!

Thursday, April 4, 2013

तुम और तुम्हारा जाना


उस काले घने बदल के बीच में से,
जब चाँद झँकता है,
और खिलखिलाकर बादलों के पीछे,
एक बार फिर छिप जाता है,
तो ऐसा लगता है जैसे,
तुमने सिखाया हो उसको,
दो पल ठंडी रोशनी भरकर,
फिर वापस चले जाना....!


झम झम आवाज़ करते हुए,
वो आवारगी से बरसता पानी,
फुहार से एकाएक, खिड़की के अंदर,
चेहरे पर भीनी सी नमी दे जाता है,
ऐसा लगता है जैसे,
तुमने सिखाया हो उसको,
चेहरे पर ताज़गी देकर,
जीवन के नीरस होना का एहसास करा जाना...!

धुआँ और यादें



बिखरी हुई सी यादें है,
धुंधले से कुछ नज़ारे है,
बेहिसाब बहता वक्त है,
और उलझे से कुछ इरादे हैं..

गुमनाम क़हकसा सा है,
माँ से किए कुछ वादे हैं,
तेरा क्या, क्या मेरा है,
हम सब यहाँ कुछ प्यादे हैं...

लंबी परछाईयाँ सी हैं,
उससे भी लंबे जाले हैं,
सब धू धू करके जल रहा है,
हर तरफ धुआँ है, और यादें हैं..
हर तरफ धुआँ है, और यादें हैं....!